Thursday, November 3, 2022

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उखाणे 1

 

 तोंड सर्वांचे लाल करतो विडा

रातराणीच्या फुलांचा रात्री पडतो सडा

...... राव माझे पती असे जणू गोड गोड पेढा

 

श्रावणात बरसल्या, धुंद जलधारा…
__रावांमुळे फुलला, संसाराचा फुलोरा

 

मेघ मल्हार रंगातच, श्रावणसर कोसळते…
__ च्या नावाने माझे, जीवनपुष्प बहरते

 

 

 


 

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काल भैरव अष्टक ( कालभैरवाष्टकम् )- Kaal Bhairav Ashtakam in Sanskrit

 भगवान भैरव शिव के स्वरूप हैं। वे कलियुग की बाधाओं का शीघ्र निवारण करने वाले देवता माने जाते हैं। खासतौर से प्रेत व तांत्रिक बाधा के दोष उनके पूजन से दूर हो जाते हैं। संतान की दीर्घायु हो या गृहस्वामी का स्वास्थ्य, भगवान भैरव स्मरण और पूजन मात्र से उनके कष्टों को दूर कर देते हैं।भगवान भैरव के पूजन से राहु-केतु शांत हो जाते हैं। उनके पूजन में भैरव अष्टक और भैरव कवच का पाठ जरूर करना चाहिए। इससे शीघ्र फल मिलता है। साथ ही तांत्रिक व प्रेत बाधा का संकट टल जाता है।

काल भैरव अष्टक

देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् ।
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ १॥

भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् ।
कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ २॥

शूलटंकपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ३॥

भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम् ।
विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ ४॥

धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशनं कर्मपाशमोचकं सुशर्मधायकं विभुम् ।
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभितांगमण्डलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ५॥

रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम् ।
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ६॥

अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं दृष्टिपात्तनष्टपापजालमुग्रशासनम् ।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ७॥

भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम् ।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ८॥

॥ फल श्रुति॥

कालभैरवाष्टकं पठंति ये मनोहरं ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम् ।
शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं प्रयान्ति कालभैरवांघ्रिसन्निधिं नरा ध्रुवम् ॥

॥इति कालभैरवाष्टकम् संपूर्णम् ॥

Ramraksha - रामरक्षा

 

                                                                          श्रीगणेशायनम: ।

अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्न्त्रस्य ।

बुधकौशिक ऋषि: ।

श्रीसीतारामचंद्रोदेवता ।

अनुष्टुप् छन्द: ।

सीता शक्ति: ।

श्रीमद्‌हनुमान् कीलकम् ।

श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥

अथ ध्यानम्

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्‌मासनस्थं । पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् ॥

वामाङ्‌कारूढ-सीता-मुखकमल-मिलल्लोचनं नीरदाभं । नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम् ॥

इति ध्यानम्

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥१॥

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् । जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥२॥

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम् । स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥३॥

रामरक्षां पठेत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम् । शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती । घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥

जिव्हां विद्यानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: । स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥

करौ सीतापति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित् । मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥

सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: । ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत् ॥८॥

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक: । पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥

एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत् । स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥१०॥

पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण: । न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥

रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन् । नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥

जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् । य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्धय: ॥१३॥

वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत् । अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥१४॥

आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: । तथा लिखितवान् प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥

आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम् । अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान् स न: प्रभु: ॥१६॥

तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ । पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥

फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ । पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥

शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् । रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥

आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्ग सङि‌गनौ । रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रत: पथि सदैव गच्छताम् ॥२०॥

संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा । गच्छन्‌ मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥

रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली । काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥

वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: । जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेयपराक्रम: ॥२३॥

इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित: । अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥

रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम् । स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥

रामं लक्ष्मण-पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम् । काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।

राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम् । वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥२६॥

रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम । श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।

श्रीराम राम रणकर्कश राम राम । श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।

श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥

माता रामो मत्पिता रामचन्द्र: । स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्र: ।

सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर् । नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा । पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम् ॥३१॥

लोकाभिरामं रणरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् । कारुण्यरूपं करुणाकरन्तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥

कूजन्तं राम-रामेति मधुरं मधुराक्षरम् । आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥३४॥

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम् । लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥३५॥

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम् । तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥३६॥

रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे । रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।

रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम् । रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥

इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम् ॥ 

॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥

Monday, September 12, 2022

Hindi poem - पैगाम

लगाकर देखो पहरा यादों पे 
चला दो हल किये इरादोपे 
बारिश में भीगी मिट्टी मेहकर सहेगी 
और हवाए हर दिशा खुशबू का पैगाम बहायेंगी
 
 
 

 

Saturday, August 20, 2022

Mazi Priya Ashi Asavi / माझी प्रिया अशी असावी


आवाज देता कोणी तुज़ीच हाक कानी यावी
मी शोधिल जेंव्हा सगळीकडे तूच दिसावी
अशीच सुन्दर मनमोहिनी माझी प्रिया असावी

जिच्या रुसन्याने हृदयावर विज पडावी
जिच्या हसण्याने बागेतील फुलेसुद्धा हसावी
अशीच सुन्दर मनमोहिनी माझी प्रिया असावी

कधी आरशात मी पाहता माझी प्रतिमा नसावी
तिथे स्वप्नातील ती माझी प्रिया असावी
अशीच  सुन्दर मनमोहिनी माझी प्रिया असावी

माझी प्रिया अशी असावी
प्रथमदर्शी तिला पाहता कविता स्मरावी
अशीच सुन्दर मनमोहिनी माझी प्रिया असावी

Wednesday, August 3, 2022

Richest Man in Babylon: Book Summary

 

The Richest Man In Babylon gives common sense financial advice which you can apply today, told through tales and parables from the times of ancient Babylon. 

Originally published in 1926, the advice in this book is still as sound as it was almost a century ago.

Lessons Learned from the  Inspiring Book Richest Man in Babylon.

  • Start your purse to fatten / Start fattening your financial accounts by saving atleast 10% every month of your total earning.

  • Control your expenses- create budget for your spending so that you will not end up in mess. 

  • Make your savings multiply- Let the money work for you.Invest your money in a intelligent way that it will multiply. Do not loose money in fraudulent schemes.

He richest man in Babylon advises to put each coin to laboring that it may reproduce a stream of wealth that shall flow constantly into your purse.

  • Guard your treasure against getting lost- Good things need protection so as the money.Many rush into luxurious deals hoping to pluck back huge profits, only except that when you risk your money, you risk losing wealth. Do not be misguided by your own selfish romantic desires to amass wealth rapidly. When investing, do not take any advice from an inexperienced person, but make safe investment decisions. 

  • Own a home- Owning a home makes you saving on rent. Considering the current rent to home price ratio,this device does not seem that beneficial in present time.

  • Increase your ability to earn-  cultivate your own powers, to study and become wiser, and to become more skillful. 

Tuesday, August 2, 2022

Hindi Poem - दुनिया ने मारे बहोत ताने मुझे

दुनिया ने मारे बहोत ताने मुझे

तब जाकर बने फसाने मेरे

 कर दो मुझे रुकसत नाराजगी से 

फिर भी रहेंगे सदा यहा तराने मेरे


Hindi poem - सच्चे दोस्त

आसु  भी बड़े अजीब हैं 
महफ़िल मैं चले आते हैं 
सच्चे दोस्तों की तरह साथ निभाते हैं 

काश सिख जाते कुछ फरेब 
तो बड़ो की तरह बेवजह मुस्कुराते 
ये सच्चे हैं पर इनका तजुर्बा कच्चा हैं 
दिल अभी भी इनका बच्चा हैं 

हम आज पुराणी तस्वीरों मैं हसी ढूंढते हैं 
मुस्कुराने को कोई वजह ढूंढते हैं 

जमाना बड़ा ही गजब हैं 
आज हाथ मैं तागा  बांधकर 
दोस्त बनता हैं दोस्ती जताता हैं 

आओ  दिलो से जुड़े सच्चे दोस्त ढूंढते हैं 
आओ अब हम सच्चे दोस्त ढूंढते हैं 

Saturday, February 26, 2022

Hindi Poem - देशप्रेम

 शौर्य, त्याग के अर्पण से |

ख़ून खौलता रंग लाता ||

संभावनाओ के दर्पण में |
देशप्रेम निखर जाता ||

                     

Friday, April 30, 2021

Hindi Poem Of Atalji

यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
स्‍मृति सुखद प्रहरों के लिए
अपने खंडहरों के लिए
यह जान लो मैं विश्‍व की संपत्ति चाहूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
क्‍या हार में क्‍या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने हृदय की वेदना मैं व्‍यर्थ त्‍यागूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्तव्‍य पथ से किंतु भागूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
-अटल बिहारी वाजपेयी

Saturday, August 4, 2018

जगन्याच्या मार्गावरती ( Marathi Poem)

जगन्याच्या मार्गावरती 

दिशाहीन चालताना 
वळणे  पुष्कळ आहेत 
जगन्याच्या मार्गावरती 
काटे पुष्कल आहेत 

जगन्याच्या मार्गावरती 
अनवाणी पायाखाली 
दगड पुष्कळ आहेत 
आणि पडताना 
हसणारे पुष्कळ आहेत 

जगन्याच्या मार्गावरती 
चुकल्यावर बोलणारे पुष्कळ  आहेत 
रडताना मात्र सोबत 
अश्रु दुर्मिळ आहेत 


पंछी की उड़ान

 पंछी की उड़ान एक नन्हा तालाब का पंछी सुनता गरूड़ो की कहानियाँ,  उसे बहुत पसंद आती  पहाड़ों की ऊंचाइयाँ। फिर उसने देखा एक ख्वाब और दिल में इ...